Tuesday, July 11, 2017

चाइना टाउन : जहां, पसरा है डर का साया








शहर के टेंगरा स्थित चाइना टाउन में इन दिनों डर का साया पसरा हुआ है। भारत और चीन के बीच तनाव ने इस इलाके को भय से भर दिया है। दोनों देशों की सेनाएं भूटान के करीब डोकलाम में आमने-सामने डटी हैं। दो देशों के बीच संबंधों के बिगड़ने का असर सीधे तौर पर कोलकाता के चीनी भारतीय समुदाय में दिख रहा है।
शहर में रहने वाले ज्यादातर चीनी एक सौ साल से कहीं ज्यादा पहले बेहतर अवसरों की तलाश में अपने देश से भागकर यहां आए थे। शुरुआत में वो मध्य कोलकाता के टिरट्््टी बाजार में बसे। बाद में इन लोगों ने टेंगरा को बसाया। साउथ टेंगरा रोड का मतलब है चाइना टाउन। यहां सौ से ज्यादा रेस्तरां हैं। दक्षिण कोलकाता के इस हिस्से में चार हजार से ज्यादा चाइनीज रहते हैं। ये आमतौर पर रेस्तरां, चमड़ा, जूता निर्माण और दंत चिकित्सा व्यवसायों से जुड़े हैं।
पहले और दूसरे अफीम युद्ध फिर चीन-जापान की लड़ाई के बाद चीन में राजनीतिक हालात खराब होने लगे थे। उस दौरान बड़े पैमाने पर चीनी लोगों ने कोलकाता आकर शरण ली। ज्यादातर चीनी म्यांमार से होते हुए यहां पहुंचे। अब तो उन्हें यहां रहते कई पीढियां गुजर रही हैं। विश्व युद्ध के दौरान चीन से आए शख्स ने यहां अपनी पहली टैनरी खोली। चीनी लोग मुख्य तौर पर कैंटन या गुआंगदांग से आकर यहां बसे। वह बढई, चमड़ा और लांड्री का काम करके गुजारा करने वाले लोग थे। उस समय कोलकाता दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के लिए व्यापार के मुख्य केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका था। यहां जहाजों में माल आता और जाता था।
चाइनीज रेस्तरां की मालिक कहती हैं कि मैं जब भी सीमा पर तनाव की खबरें सुनती हूं तो डर जाती हूं।  एक अन्य रेस्तरां के मालिक कहते हैं हम पहले भारतीय हैं, हम भारतीय नागरिक हैं, लेकिन दिल से अपनी मातृभूमि को भी प्यार करते हैं।
जब भारत और चीन के बीच सीमा पर ताजा तनाव शुरू हुआ तो कोलकाता का चीनी समुदाय भय से भर उठा। उसे डर है सीमा पर दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति में चीन विरोधी भावनाएं उन पर असर डालेंगी। 1962 के भारत-चीन युद्ध में वो डर के साए में जी चुके हैं। उन्हें ये भी लगता है कि मौजूदा हालत से भारत और चीन के बीच व्यापार प्रभावित होगा और असर उनके टैनरीज पर भी होगा।

बसीरहाट की हिंसा ने टॉकी से पर्यटकों को किया दूर







कोलकाता, 11 जुलाई
उत्तर चौबीस परगना जिले के बसीरहाट शहर में हुई सांप्रदायिक हिंसा के कारण इच्छामति नदी के किनारे बसे पर्यटकों के प्रिय स्थल टॉकी से लोग दूर ही रह रहे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि वे जल्द ही वहां नहीं आने वाले हैं।
गौरतलब है कि टॉकी पर्यटन स्थल कोलकाता से महज 70 किलोमीटर की दूरी पर है। लेकिन वहां जाने वालों को बसीरहाट होते हुए जाना पड़ता है। इच्छामति नदी के किनारे बसे छोटे से शहर टॉकी के पास ही बांग्लादेश की सीमा है। भीषण गर्मी के दिनों को छोड़ कर साल भर टॉकी में पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है।
नदी के किनारे बसे पर्टटन स्थल पर हालांकि हिंसा की छाया नहीं पड़ी, इसका श्रेय दोनों संप्रदाय के स्थानीय लोगों, होटलों के मालिकों और दूसरे लोगों को दिया जा सकता है। जिनके कारण लोग सुरक्षित वहां से निकलने में कामयाब रहे। यहां एक प्रसिद्ध भोजनालय के मालिक विमल चंद्र दे का कहना है कि सामान्य कार्य दिवस में  प्रतिदिन 60-70 ग्राहकों को भोजन खिलाता हूं। कई बार यह संख्या बढ़ कर 100 और छुट््टी के दिनों में 150 तक पहुंच जाती है। लेकिन बीते सारे हफ्ते के दौरान यह संख्या शून्य से लेकर ज्यादा से ज्यादा पांच ग्राहकों की संख्या पार नहीं कर सकी। अगर कुछ महीनों तक यही हालत जारी रही, तब मुझे अपनी दूकान बंद करनी होगी।
इसी तरह, दूसरे  एक गेस्ट हाउस के मालिक तापस चटर्जी का कहना है कि आठ और नौ जुलाई को हमारे सारे कमरे बुक हो चुके थे, जिसे बाद में रद्द कर दिया गया। यहां अब हालात पूरी तरह से सामान्य हो चुके हैं, लेकिन अभी तक एक भी कमरे की बुकिंग नहीं हुई है। मुझे यह समझ नहीं आ रहा है कि अगर यही स्थिति जारी रहेगी, तब कैसे काम धंधा चलेगा।
टॉकी घाट के नाव वालों की हालत भी दूसरे लोगों से कुछ कम नहीं है। यहां से लोग बांग्लादेश सीमा के नजदीक मचरंगा द्वीप देखने के लिए जाते हैं। यहां के नाविक शुकूर आलम का कहना है कि बादुरिया और आसपास के इलाकों में उपद्रव शुरू होने के बाद 2 जुलाई से ही उनकी आमदनी शून्य हो गई है क्योेंकि कोई पर्यटक इधर आ ही नहीं रहा है।
आलम का कहना है कि बसीरहाट शहर सात जुलाई से सामान्य है। इसके बाद भी पर्यटक टॉकी की ओर रूख नहीं कर रहे हैं। आठ जुलाई को मुझे कोई भी ग्राहक नहीं मिला, जबकि नौ जुलाई को एक परिवार यहां आया था।
गौरतलब है कि यह छोटा सा गांव विजय दशमी के दिन दुर्गापूजा के विसर्जन के लिए प्रसिद्ध है। जब भारत और बांग्लादेश के लोग मूर्तियां विसर्जित करनेके लिए  यहां आते हैं। इस मौके पर दोनों समुदाय के लोग मिठाइयों से एक दूसरे का मुंह मीठा करवाते हैं। नदी के दोनों किनारों पर दोनों देशों के हजारों लोग यह दृश्य देखने और अपने मोबाइल कैमरे में बंद करने के लिए घंटों खड़े रहते हैं।
मौजूदा हालात को देखते हुए यहां कारोबार करने वालों को दुर्गापूजा के मौके पर होेने वाले पर्यटकों की भीड़ को लेकर भी आशंका देखी जा रही है। हालांकि अभी पूजा में दो महीने से भी ज्यादा का समय बाकी है। इसके बाद भी होटल, भोजनालय, नाविक पर्यटकों के इलाके से दूर रहने के कारण चिंतित हैं। 

Monday, July 10, 2017

नानक के बताए रास्ते पर चलकर लोगों की सेवा







कोलकाता, 10 मई
सिख धर्म की नींव गुरू नानक देव जी ने मानव धर्म की सेवा करनेके लिए रखी थी। नाम जपो, वंड छको और किरत करो अर्थात एक अकाल पुरख का सिमरन करो, कमाई का हिस्सा लोगों में बांट कर खुद भोजन करो और मेहनत की कमाई करो। उनके बताए रास्ते पर चलते हुए हावड़ा जिले में एक व्यक्ति लोगों को भीषण गर्मी में प्यास बुझाने के लिए पानी पिला रहे हैं। बीते पांच साल से हर साल तीन महीने बगैर किसी की आर्थिक या दूसरी मदद के अकेले वे यह काम कर रहे हैं।
सिद्धू आटोमोबाइल के मेघा सिंह सिद्धू ने बताया कि इलाके में गर्मी के दौरान   पेय जल का संकट दिखाई देता है। यहां नेशनल हाइवे नंबर छह के  धुलागढ़ इलाके में आने-जाने वाले लोगों की हालत ऐसी नहीं है कि खरीद कर पानी पी सकें। इसलिए पांच साल पहले मन में यह विचार आया कि प्यासों की प्यास बुझाने के लिए कुछ किया जाए। पहले साल का अनुभव बेहद अच्छा रहा। लोगों ने पानी पीकर आर्शीवाद दिया, तो लगा कि बाबा नानक के बताए रास्ते पर चलकर लोक सेवा का यह एक अच्छा माध्यम है।
उन्होंने बताया कि तब से सुबह 10 बजे से लेकर दोपहर एक बजे तक प्रतिदिन यहां लोगों को पानी पिला रहे हैं। उनका मानना है कि आने वाले सालों में भी यह सिलसिला जारी रहेगा। 

मिनी यूरोप की झलक दिखती है सदर स्ट्रीट में






कोलकाता, 10 जुलाई
करीबन तीन सौ वर्ष से भी पहले अंग्रेजों ने कलकत्ता शहर की बुनियाद रखी थी, जो आज दुनिया भर में अपने बदले हुए कोलकाता के नाम से परिचित है। इस शहर में देश के सभी राज्य के लोग रहते हैं। सभी धर्म, जाति व वर्ग के लोग दशकों से इस शहर में घुल-मिल कर रहते आ रहे हैं, लेकिन शायद कुछ लोगों को यह जान कर हैरत होगी कि कोलकाता में एक मिनी यूरोप बसता है। शहर का एक ऐसा इलाका, जहां यूरोप के विभिन्न देशों के लोग बड़ी संख्या में नजर आते हैं और इस जगह का नाम है सदर स्ट्रीट।
विदेशी पर्यटकों को भारत की यह सांस्कृतिक राजधानी काफी पसंद है, इसलिए प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी कोलकाता का रुख करते हैं। यूं तो दुनिया के लगभग सभी देश के पर्यटक कोलकाता आते हैं, लेकिन इनमें ब्रिटेन, इटली, जर्मनी, डेनमार्क समेत यूरोपिय देशों के पर्यटकों की संख्या अधिक होती है। अंग्रेजों को तो यूं भी इस शहर से काफी लगाव है। 1947 में भारत से अपना बोरिया-बिस्तर लपेट लेने के बावजूद उनका खुद द्वारा बसाए गए इस शहर से प्यार कम नहीं हुआ है।
सदर स्ट्रीट का इतिहास ढाई सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। कहते हैं कि कभी यहां एक सदर अदालत थी, जिसके नाम पर इस इलाके का नाम सदर स्ट्रीट पड़ा। मिर्जा गालिब स्ट्रीट स्थित दमकल केंद्र से लेकर चौरंगी स्ट्रीट स्थित इंडियन म्यूजियम (जादूघर) तक फैले इस छोटे से इलाके में फैले सदर स्ट्रीट में जिधर भी नजर दौड़ाएं, आपको छोटे-छोटे होटल व रेस्तरां ही मिलेंगे, जो पूरी तरह विदेशी पर्यटकों से भरे पड़े रहते हैं।
यहां आने वाले विदेशी पर्यटकों को सदर स्ट्रीट में उस समय की झलक मिलती है, जब इस देश पर अंग्रेजों की हुकुमत थी, लेकिन सबसे बड़ा आकर्षण जो इन्हें यहां खींच लाता है, वह है यहां के सस्ते होटल व रेस्तरां। इलाके में स्थित कैफे के मालिक राजेंद्र पाल कहते हैं कि यहां होटल के कमरे का किराया और खाना-पीना इतना सस्ता है कि भारत तो छोड़िए दुनिया के किसी भी देश में इतना सस्ता नहीं मिलेगा।
सदर स्ट्रीट के हर कोने में ऐसे कैफे मिल जाएंगे, जो यूरोपीय डिश पेश करते हैं। यहां बड़ी संख्या में ट्रैवल एजंट कई तरह के आॅफर लिए घूमते हुए मिल जाएंगे। कई बीयर बार हैं, जहां विशेष रुप से फैमली सेक्शन बनाया गया है। अब तो यहां कुछ लक्जरी होटल भी बन गए हैं, लेकिन अभी भी यहां छोटे-छोटे होटलों की ही भरमार है, जिन्हें अगर सरायखाना भी कहा जाए तो गलत न होगा।
सदर स्ट्रीट केवल यूरोपियई लोगों का ही पसंदीदा इलाका नहीं है, बल्कि कोरियाई पर्यटकों की भी बड़ी संख्या में यहां दिखाई देती है। चायवाले से लेकर ठेले वाले तक सायानारा कहते हुए उनका स्वागत करते हैं। यहां के चायवालों को ब्रिटिश अंदाज में अंग्रेजी बोलते हुए देख काफी लोग हैरत में पड़ जाते हैं। यहां के ठेले वाले कोरियाई नागरिकों से उन्हीं की भाषा में बात करते हैं। हद तो यह है कि विदेशी पर्यटकों से भीख मांग कर गुजर-बुसर करने वाले छोटे-छोटे बच्चे भी फर्राटे से अंग्रेजी बोलते हुए दिखाई देते हैं।

जीएसटी से रसोई गैस की सभी सेवाएं हुई महंगी







कोलकाता, 10 मई
जीएसटी लागू होने के बाद रसोई गैस की कीमत बढ़ेगी,यह आशंका पहले ही जाहिर की जा रही थी। इस महीने के शुरू से जीेएसटी चालू होने के बाद देखा जा रहा है कि एक ही झटके में रसोई गैस के सिलेंडर पर 32 रुपए का खर्च बढ़ गया है। लेकिन इतना ही होता तो गनीमत थी। रसोई गैस डीलरों के पास पहुंचे निर्देश के मुताबिक एलपीजी से संबंधित सभी मामले में   जीएसटी लगेगा। रसोई गैस के मामले में यह जहां पांच फीसद है, दूसरे मामलों में यह 18 फीसद है। हाल तक इस बारे में किसी तरह का अतिरिक्तकर नहीं लगता था।
मालूम हो कि पश्चिम बंगाल में रसोई गैस के सिलेंडर पर चार फीसद वैट लगता था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में जब सत्ता संभाली, दिल्ली में यूपीए की सरकार ने अचानक रसोई गैस की कीमतें बढ़ा दी। राज्य के लोगों को राहत देने के लिए मुख्यमंत्री ने जून 2011 में वैट से छूट देने का एलान किया। तब से रसोई गैस पर वैट नहीं लगता था। लेकिन अब केंद्र सरकार ने सबसिडी वाले सिलेंडर पर पांच फीसद जीएसटी लागू कर दिया है। बगैर सबसिडी वाले सिलेंडर पर यह लागू नहीं है। जीएसटी सिलेंडर की कीमत पर लगता है, इसके तहत राज्य में सिलेंडर की कीमत में 32 रुपए की वृद्धि हुई है।
दूसरी ओर, रसोई गैस से जुड़ी दूसरी सेवाओं पर 18 फीसद जीएसटी लगाया गया है। इस बारे में सरकारी निर्देश भी पहुंच गया है। बताया जाता है कि गैस में किसीतरहकी समस्या नहीं होने पर भी एक तय समय के भीतर गैस सर्विस करवाना बाध्यतामूलक  हो गया है। ग्राहकों को जीएसटी समेत काम करवाना होगा। हालांकि डीलरों का कहना है लीकेज जैसे आपातकालीन समस्या होने पर जीएसटी नहीं ली जाएगी।
सूत्रों ने बताया कि जीएसटी लागू होने के बाद रसोई गैस का नया कनेक्शन लेने के लिए 75 रुपए से बढ़कर 89 रुपए, गैस ट्रांसफर के लिए दस्तावेज जमा करवाने की रकम 75 से बढ़कर 89 रुपए, रेगुलेटर खराब होने से संबंधित कागज जमा करने की फीस 75 से बढ़कर 89 रुपए, नए कनेक्शन में खर्च 100 रुपए से बढ़कर 118 रुपए, दूसरे सिलेंडर के लिए 100 रुपए से बढ़कर 118 रुपए, नई ब्लू बुक के लिए 50 रुपए के बजाए 59 रुपए, सिंगल ओवन की मरम्मत के लिए 100 रुपए के बजाए 118 रुपए, दो ओवर वाले चुल्हे की मरम्मत के लिए 150 रुपए के बजाए 177 रुपए का भुगतान करना होगा। 

Sunday, July 9, 2017

कुछ लोग जानबूझ कर, तो कुछ नासमझी में करवा देते हैं दंगा


कुछ लोग जानबूझ कर, तो कुछ नासमझी में करवा देते हैं दंगा




कोलकाता, 9 जुलाई  
फेसबुक, ट्विटर, वाट्सएप जैसे सोशल मीडिया साइट पर कुछ लोग तो सोच-समझ कर लोगों को भड़काने, अफवाहें फैलाने की साजिश रचते हैं। जबकि ज्यादातर लोग नासमझी में किसी भी तरह की वीडियो, फोटो देखकर भावनाओं में बहकर तुरंत उस आपत्तिजनक वीडियो, फोटो या संदेश को दूसरे को भेज देते हैं। इस तरह, एक फर्जी सूचना से हजारों लोग गुमराह हो जाते हैं और कई बार दंगा इतना ज्यादा भड़क जाता है कि हजारों नहीं लाखों लोगों को परेशानी का शिकार होना पड़ता है।
हाल में एक भोजपुरी फिल्म ‘औरत खिलौना नहीं’ चर्चा में है। लेकिन चर्चा का कारण फिल्म का अच्छा, खराब, हिट या फ्लाप होना नहीं है। देश के ज्यादातर लोगों को तो पता भी नहीं कि ऐसी भी कोई फिल्म है। लेकिन एक व्यक्ति ने फिल्म का एक दृश्य सोशल मीडिया पर किसी को भेज दिया। जिसे दूसरे-तीसरे व्यक्ति से होता हुआ हजारों लोगों तक पहुंच गया। इस दृश्य में महाभारत के चीरहरण दृश्य को दोहराते हुए खलनायक नायिका का वस्त्र हरण करता दिखाया गया । लेकिन वीडियो पोस्ट करने वाले ने फिल्म का दृश्य यह लिख कर आगे जारी किया कि पश्चिम बंगाल में महिलाओं पर अत्याचार हो रहा है। हालांकि जल्द ही ज्यादातर लोगों को पता चल गया कि फर्जी वीडियो जारी करके लोगों को भड़काया जा रहा था।
इसी तरह, नौ नवंबर 2016 को बांग्लादेश के कुमिल्ला में खुले आम रास्ते पर प्रसिद्ध समाजसेवक और अवामी लीग के सदस्य मुनीर हुसैन सरकार को आतंकवादियों ने पीट-पीट कर मार डाला था। बांग्लादेश में आतंकवादियों की ओर से की जा रही वारदातों के बारे में जानकारी देने के लिए ‘चोला फाउंडेशन आनलाइन ’ ने इसे जारी किया था। लेकिन दंगाई मानसिकता वाले लोगों ने इसे यह बताकर पोस्ट किया कि पश्चिम बंगाल में आतंकवादी निर्दोष लोगों की हत्याएं कर रहे हैं।
फेसबुक पर फर्जी तस्वीरों और वीडियो अपलोड करने के मामले में पुलिस ने कुल मिलाकर अभी तक दो लोगों को गिरफ्तार किया है। कोलकाता पुलिस आयुक्त की ओर से ट्विटर पर लोगों सेअपील की गई है कि सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वालों के बारे में पुलिस को 100 नंबर डायल करके सूचित करें। इसके साथ ही लोगों को सचेत रहने की जरुरत है कि आपको मिलने वाला वीडियो प्यार-मोहब्बत या किसी के चेहरे पर खुशी-हंसी लाने वाला हो, तब उसे आगे भेजे। ऐसा कुछ भी भावनाओं में बहकर फारवर्ड न करें कि बाद में आपको पछताना पड़े। पकड़े गए लोगों के खिलाफ पुलिस ने आइपीसी समेत आइटी की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज करने के साथ ही मोबाइल, लैपटाप भी जब्त कर लिया है। 

Friday, July 7, 2017

एक ओर दंगों का माहौल, दूसरी ओर अभी भी गलबहियां डालते हैं हिंदू-मुसलमान

एक ओर दंगों का माहौल, दूसरी ओर अभी भी गलबहियां डालते हैं हिंदू-मुसलमान 
रंजीत लुधियानवी
कोलकाता, 6 जुलाई  
उत्तर चौबीस परगना जिले के बादुरिया के इस गांव में अजान होने के बाद कीर्तन होता है। कीर्तन करने वालों की टोली जहां हिंदुओं के घर जाती है, वहीं मुसलमानों की चौखट पर भी जाती है। मस्जिद के सामने भी हरि कीर्तन के बोल गुंज उठते हैं। इस गांव में दुर्गापूजा होती है। पूजा का माइक मस्जिद के सामने बांधा जाता है। पुष्पांजलि के मंत्र मंस्जिद के करीब से चारों ओर गुंजते हैं। गांव में सदियों से हिंदू-मुसलमान रहते हैं। मुसलमान के गरियारे में हिंदुओं की गाय बंधती है। लोगों को पता ही नहीं चलता कि कौन हिंदू है और कौन मुसलमान है। इलाके के लोगों ने कभी यह समझने की कोशिश भी नहीं की कि कौन किस धर्म को मानने वाला है। लेकिन अचानक जैसे स्वर बदल गए हों। 
गांव का नाम मांगुरखाली है। गांव के शौभिक सरकार (18) के फेसबुक पोस्ट के कारण उत्तर चौबीस परगना जिले के बादुरिया, देगंगा, बसीरहाट, स्वरुपनगर समेत आसपासके इलाकों में तनाव फैल गया। हालांकि यह गांव अभी शांत है। युवक के घर कुछ लोगों ने आग लगा दी थी, लेकिन मिलन मस्जिद कमेटी के अध्यक्ष अमिरुल इस्लाम ने आग पर पानी डाल दिया। गोबरडांगा से दमकल की गाड़ी लेकर मखसूद पहुंचे थे। इससे लगता है कि सारे उन्माद ग्रस्त नहीं हैं। अगर ऐसा होता तो हिंदू के घर की आग बुझाने मुसलमान क्यों परेशान होते? 
अमिरुल भतीजे शबीन रहमान को लेकर हाबरा गए थे, शाम साढ़े छह बजे मोबाइल पर उनके गांव के अध्यापक त्रिदिव चौधरी ने कहा कि अमिरूल चाचा, शौभिक के घर हमला हो रहा है। आग लगाने की कोशिश की जा रही है। तुम जल्द से जल्द यहां पहुंचो। करीब घंटा भर बाद जव वे गांव लौटे, 300 लोगों का एक दल बबलू सरकार के घर हमला करने में लगा था। बबलू शौभिक के पिता का बड़ा भाई है। मां की मौत के बाद ग्यारहवीं का छात्र उनके घर ही रहता है। लकड़ियां जला कर खिड़की से भीतर डाली जा रही थी। पागल भीड़ के सामने हिंदू-मुसलमान कोई नहीं था। 
उस दिन के बारे में बताते हुए कांपती जुबां में अमिरुल बताते हैं कि  कि सैकड़ों अनजान युवक हमला कर रहे थे, विरोध करने पर उल्टे उन्होंने पूछा कि आप कौन होते हैं? मैने बताया कि मैं कौन हूं, लेकिन उन्होंने कोई परवाह नहीं की औरअपना काम करते रहे। बबलू का मकान जल रहा था। वे दौड़ कर मित्रों को बुला कर लाए। गांव को युवक मखसूद दमकल कर्मचारी है। वह गोबरडांगा से दमकल की गाड़ी लेकर पहुंचा। हिंदू-मुसलमानों ने मिलकर आग बुझाई। 
गांव में रहने वाले करीब दो हजार लोगों को अब भी भरोसा नहीं हो रहा है कि बाहर से आकर लोगों ने एक घर में आग लगा दी। सांप्रदायिक तनाव तो दूर की बात है, मतदान के समय भी गांव के दो बूथों पर कभी मारपीट नहीं हुई। इसलिए दूसरे इलाकों में हिंसा होने के बाद भी यह इलाका शांत ही है। 
मस्जिद की दूसरी ओर शौभिक का घर है। पास में ही मनोरंजन मंडल रहते हैं। वृद्ध मंडल के मुताबिक ईद में सभी लोगों को आमंत्रित किया गया था, सारे लोग गए थे। शौभिक की एक गलती के लिए हमें लज्जित होना पड़ रहा है। उनकी ही तरह श्यामछेल मंडल काकहना है कि वे हमारे मास्टर मोशाए हैं, हम सारे उनके छात्र हैं। इस गांव के सभी लोग पारिवारिक समारोह में एक दूसरे के घर जाते हैं। 
युवा मोहम्मद रियाजुल सरदार ने बताया कि मंगलवार को गांव में पुलिस आई थी। इसके बाद पुलिस नहीं आई क्योंकि हमारे गांव में कोई विवाद नहीं है। बबलू के साथ सिराजुल मंडल एक ही स्कूल में पढ़ते थे। उनका कहना है कि मेरे बचपन के मित्र हैं और शरीफ इंसान हैं। 
गौरी मंडल भी हैरान-परेशान हैं, गांव में पहले कभी हंगामा नहीं देखा था। उनका कहना है कि मसजिद में अजान के बाद हम कीर्तन करते हैं। कभी किसी ने कुछ नहीं कहा। गांव के लोगों का कहान है कि यहां सदियों से सांप्रदायिक सौहार्द कायम है और रहेगा, लेकिन बाहरी लोग कैसे इलाके में घुसे इसे लेकर लोग चिंतित हैं। 
इसी तरह, बादुरिया के मलयपुर में बीते 30 सालों से आसपास रहने वाले सुमेन सेन और अब्दुल बारिक मंडल का कहना है कि किसी भी स्थानीय व्यक्ति को हिंसा करते हुए नहीं देखा गया। हंगामे के दौरान हमलोग जान बचाने के लिए घर से भाग गए,ऐसा नहीं करते तो कोई नहीं बचता।